निर्भया तेरे बहाने..!!!

कर्नाटक के पूर्व डीजीपी के विवादित बयान पर निर्भया से काल्पनिक बातचीत

निर्भया तुम तो चली गई..लेकिन तुम्हारे जाने के बाद भी तुम्हारे चर्चे हो रहे हैं...इस बार जो चर्चा हुई है....वो तुम्हारे बलात्कार को लेकर नहीं बल्कि उस शरीर को लेकर हो रही है....जिसको ....गैंग रेप के बाद तुम देखकर रो रही थी...आज तुम्हारे उस उधड़े शरीर की परवाह किए बिना... लोग तुम्हारे फीज़िक का एनालसिस...कर रहे हैं... तारीफ कर रहे हैं.....और पता है ये सब कैसे हुआ......दरअसल कर्नाटक के पूर्व डीजीपी एच टी सांगलियान ने तुम्हारी मां के फिज़ीक को देखकर..ये.अंदाज़ा लगाया...और सबके सामने ये कहने में कोई शर्म नहीं की......कि अगर तुम्हारी मां का शरीर इतना सुंदर है...तो तुम्हारा यानी हमारी निर्भया का कैसा होगा..तुम कितनी सुंदर होगी ??....अरे मेरी पढ़ाकू दोस्त तेरा सपना भी तो था..कि एक दिन तेरे मम्मी पापा को तेरा एक्ज़ाम्पल दिए जाए...तो क्या हुआ जो वो तेरी पढ़ाई..तेरी हिम्मत के लिए नहीं मिला...एक लड़की के लिए सुंदरता का कॉम्पलीमेंट पाना ही तो सबसे बड़ा लक्ष्य होता है.....और हां अब कुछ लोग बलात्कार वलात्कार के बारे में नहीं सोचते...दूर तक जाती है सोच.....दूर तक.... ...
अब ये सब सुनकर..तुम खुश हो जाओ...!! अपने सारे दुख भुला दो...अब नफरत मत करना उस शरीर से..जो गैंग रेप में फाड़ चीर दिया गया था...और बार बार ये भी दोहराना बंद करो...कि आत्मा पर जो चोट लगी उसका क्या ?...अरे आत्मा वात्मा से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता...तुमको लेकर कल्पनाएं नए चरम छू चुकी हैं.....कुछ लोग सोचते हैं......कि हाय !! तुम कितनी सुंदर रही होगी...जो वो 6 पुरुष तुमको देखकर खुद को रोक नहीं पाए होंगे..?..तुम्हारी स्कर्ट कितनी छोटी रही होगी .वगैरह वगैरह...अरे तुमको क्या पता..कुछ लोगों में....तुम बड़ी मॉडर्न टाइप की लड़की बताई जाती हो..जो बड़ी आज़ाद ख्यालातों की है....नाइट फिल्म शो देखने जाती है......मस्त सा बॉयफ्रेंड भी है..तुम्हारी तारीफ इतनी हो जाती थी..कि कई बार तो बलात्कार का मुद्दा साइड में हो जाता...तुम्हारे साथ हुई क्रूरता तो किसी को  याद ही नहीं रहती...उसकी जगह बलात्कार पीड़िताओं...अरे काहे की पीड़िताएं...सॉरी ऐसा कहने के लिए...बलात्कार का मज़ा लेने वाली लड़कियों की सकर्ट्स पर बहस छिड़ जाती...अब इसी में लेटेस्ट तुम्हारे शरीर की सुंदरता का मुद्दा छाया है...तुम्हारी मम्मी ने भी डीजीपी अंकल की बातों बातों में छेड़खानी का विरोध तो कर दिया है...लेकिन हैं तो वो उसी लड़की की मम्मी ही...जिसे देखकर कुछ कुछ होने लगता है....देखो .इतनी तारीफ कर दी...तो अब ये मत कहना कि तुम्हारे साथ रेप की दूसरी छोटी छोटी बच्चियां भी अपनी तारीफ सुनना चाहती हैं...उनको कह दो....कि अभी वो बहुत छोटी हैं.....ना ही उनके पास सेक्सी टांगे हैं...ना ही मस्त सा फिगर...उनके लिए तो डीजीपी अंकल जैसे लोगों के पास भी कोई जवाब नहीं है.......

पंजाबी फिल्म लौंग-लाची में कटना चाहिए ये सीन

क्या फिल्मों में महिला के साथ घरेलू हिंसा दिखाना किसी भी तरह से कॉमेडी हो सकता है?? 
एक पंजाबी रोमांटिक कॉमेडी फिल्म 'लौंग लाची' में ऐसा सीन दिखाया गया है....जहां महिला को उसका पति कमरे में बंद करके पीटता है और दर्शकों के लिए ऐसे साउंड इफ़ेक्टस दिए जाते हैं जैसे कोई कॉमेडी सीन चल रहा हो...इसके बाद जब कमरे का दरवाज़ा खुलता है तो जख्मी महिला दिखाई जाती है....एक फ़िल्म में अपनी बात कहने के ढेरों तरीके हो सकते हैं...लेकिन ऐसा तरीका अपनाना बेहद गलत है..अब ये कहा जाए कि एक पिछड़े गांव का जो माहौल को दिखाया गया है...उसमें ये सीन फिट है...तो ऐसे निर्देशन को और बहुआयामी होने की ज़रूरत है....हैरानी है कि सेंसर बोर्ड ने इस सीन पर कैची क्यों नहीं चलाई.?..और कोई भी इसके खिलाफ बोला क्यों नहीं?...क्या घरेलू हिंसा हमारे लिए इतनी साधारण बात हो चुकी है? कि अब हम इसे कॉमेडी के रूप में भी स्वीकार कर रहे हैं..?खुदा ना खास्ता अगर ये हाल रहा तो कल को हमें कत्ल और रेप जैसे जघन्य अपराध भी कॉमेडी के रूप में दिखने शुरू हो जाएंगे.... फ़िल्म में ये सीन काटना ही चाहिए.

लोया पर अब क्यों रोया CARAVAN ??

गुजरात में चुनावी मौसम और मोदी की लहर के बीच सहराबुद्दीन एनकाउंटर केस एक बार फिर से सुर्खियों में है....अग्रेज़ी न्यूज़ मैगज़ीन CARAVAN ने अमित शाह पर मामले की जांच में न्यायिक प्रणाली को प्रभावित करने का आरोप लगाया है.....मैगज़ीन ने परिवार के हवाले से ये आरोप लगाया है कि केस की सुनवाई कर रहे जज बी.एच लोया की मौत हार्ट अटैक से नहीं बल्कि साज़िशन हुई थी...ताकि केस में मनमाफिक जजमेंट दिलाई जा सके...जस्टिस के परिवार वाले भी सामने आए हैं,....और साज़िशन मारे जाने के बहुत सारे संदेह सामने रखे च हैं...भात में न्यायिक तंत्र को अपने फेर में करना अब कोई बड़ी बात नहीं है..हो सकता है कि मैगज़ीन  और परिवार की बातों में कुछ सच्चाई हो...लेकिन उनके सामने आने का वक्त अपने आप में बहुत से सवाल खड़े करता है...जिससे वो खुद कटघरे में खड़े हो गए हैं...जस्टिस की मौत कोई छोटी बात नहीं होती...परिवार के मुताबिक उन्हें पहले ही इसका शक होने लगा था...कि उनको मारा गया है..तो सवाल ये है कि जस्टिस के परिवार ने आवाज़ क्यों नहीं उठाई...चलो मान लिया कि उन पर दबाव होगा...लेकिन दबाव अगर बनाना ही होता...तो सबसे पहले सहराबुद्दीन के एनकाउंटर के बाद उसके परिवार वालों पर बनाया जाता ताकि वो केस ही ना करें....लेकिन ऐसा क्यों नहीं हुआ...? एक और तर्क यहां ये है कि परिवार की कोई आवाज़ नहीं बना..किसी ने उनकी ख़बर छापी नहीं..जस्टिस की मौत दिसंबर 2014 में हुई..तब तक तो सोशल मीडिया भी भारत पर खूब छाया हुआ था....सोशल मीडिया पर ही कोई मुहिम चला देते...बहस छिड़ती..लोगों तक बात पहुंचती...तो दबाव भी बन जाता......विपक्षी तो साथ देते ही...बहुत से लोग भी जुड़ जाते...सोशल मीडिया में इतनी ताकत तो है ही.,,फिर इसे आप देश के बाहर रहकर भी ऑपरेट कर सकते थे..कोई डर भी ना रहता....लेकिन आपने ऐसा कुछ नहीं किया...क्यों ? आजकल आम लोग अपनी छोटी छोटी समस्याओं की शिकायत सोशल मीडिया पर करते हैं...और खूब चर्चा होती है...तो फिर आपने ऐसा क्यों नहीं किया...? मामला दबा क्यों दिया....दोषी तो आप भी हैं...आपको अपने संदेह बताने से किसी ने नहीं रोका था...ऐसे में ये तर्क भी जाता रहा....कि किसी ने नहीं छापा....अब गुजरात चुनाव के दौरान किसी मैगज़ीन ने आपकी बात को रखा है,,.वजह साफ है..उंसे भी पैसे कमाने हैं.....चुनाव की बहती गंगा में हाथ धोना है,,,,अब जस्टिस लोया के परिवार को भी लोग विरोधी पार्टियों के नुमाइंदों के तौर पर ही देखेंगे.....CARAVAN की रिपोर्ट और भी सवाल उठाती है....रिपोर्ट में क्लिन चिट मिलने पर सवाल है...तो क्या ये माना जाए...कि जिन न्यायाधीश ने ये फैसला सुनाया था....उनकी नैतिकता पर सवाल उठाया जा रहा है....? रिपोर्ट में कहा गया कि जिस न्यायाधीश को 100 करोड़ की पेशकश की गई थी....उन्हें कहा गया था कि क्लीन चिट वाले दिन मीडिया का इस ख़बर से ध्यान भटकाने के लिए एक बड़ी ख़बर आएगी...उसकी तैयारी भी हो गई है,....आगे कहा है कि जिस दिन शाह को क्लीन चिट मिली..उस दिन क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी ने टेस्ट क्रिकेट से सन्यास ले लिया....तो ऐसे में क्या ये भी माना जाए..कि ये भी प्लानिंग थी....साज़िश थी...अगर ऐसा है...तो उनसे भी पूछताछ कर लो...सौ बात की एक बात ये है कि किसी अनसुलझे सवालों का जवाब चाहिए हो...तो वक्त पर चोट करनी पड़ती है...बेवक्त कुछ सुलझाना आसान नहीं होता...बाद में तो सभी इसे राजनीतिक फायदे के लिए प्रचारित एक दांव ही मानते हैं....

भारत में कन्फ्यूज़न का 'कारवां'

एक फिल्म का एक गाना आजकल भारत की स्थिति पर सबसे सटीक है...कन्फयूज़न ही कन्फयूज़न है सोल्यूशन कुछ पता नहीं....भारत में आज हर मुद्दा कन्फ्यूज़न क शिकार हो गया है...कनफ्यूज़न का ये वायरस मोदी सरकार के आने के साथ ही फैलना शुरू हो गया था...हाल ही सरकार के कार्यकाल में ये ज़्यादा बढ़ा है...मोदी जी जब पीएम उम्मीदवार बने तो लोगों में संदेह बढ़ा कि वो देश की धर्मनिरपेक्षता के लिए सही होंगे या फिर घातक...विरोधियों का तो काम था लेकिन मीडिया ने भी इस कन्फ्यूज़न को खूब बढ़ाया...खूब पैसा बनाया....कलाकारों ने सम्मान लौटाने शुरू कर दिए.... इतना कन्फ्यूज़न हो गया... कि भ्रम की स्थिति बनने लगी,....लोगों को डराया जाने लगा....कि अगर मोदी जी की सरकार आती है तो ऐसा होगा वैसा होगा....लेकिन लोगों ने इस स्थिति में अपने विवेक से काम लिया....और नरेंद्र भाई मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया.

.आज फिर से देश के सामने कन्फ्यूज़न की स्थितियां हैं...काले धन को लेकर नोटबंदी का फैसला हुआ...तो लोगों ने इसे काले को सफेद करने वाली तरकीब बता दी..जबकि सरकार ने काले धन पर नकेल कसने की बात कही...मीडिया भी दो हिस्सों में बंट गया...एक नुकसान गिनाने के लिए ऐसे ऐसे गांवों में चक्कर लगा आया..जहां पहले वो कभी नहीं गया...वहीं दूसरा नोटबंदी के बाद बैंकों में जमा हुए पैसों की गिनती बताकर इसका फायदा दिखाने लगा.....लेकिन कोई असल बात समझा नहीं पाया.....नतीजा कन्फ्यूज़न...फिर आई जीएसटी...फायदा करा गई या नुकसान कुछ पता नहीं...ज्ञानी लोग कोसते हुए तो बहुत नज़र आए...लेकिन किसी का तर्क गले नहीं उतरा....सरकार भी समझाने में विफल रही..

लोग अभी इनसे जूझ ही रहे थे कि इसी बीच न्यायिक और पुलिसया व्यवस्था में फैला कन्फ्यूज़न भी सामने आ गया...आरुषि मर्डर केस में कुछ भी पता ना चल पाया..आरुषि को माता-पिता ने मारा...या फिर किसी ओर ने ? किसी नतीजे पर पहुंचा नहीं जा सका..पूरा देश कन्फ्यूज़ ही होता गया....लोग हत्याकांड पर पहले की तरह फिर से अपनी अपनी थ्योरी लगाने लगे.मीडिया फिर चालू हो गया..कुछ दिन गुरमीत बाबा और उनकी कथित बेटी के रिश्तों के सेक्सी कन्फ्यूज़न ने मायाजाल में उलझाए रखा...  काफी देर बाद लोग हनीट्रैप से बाहर निकले तो देश के इतिहास में भी कन्फ्यूज़न हो गया....निर्देशक संजय भंसाली ने पद्मावति लाकर लीला कर दी...फिल्म भी ऐसी बनाई कि लोगों में कई राय बन गई..राजपूत विरोध करने लगे...तो कई वरिष्ठों को इसमें कोई ख़राबी नज़र नहीं आई...भंसाली ने फिल्म में क्या दिखाया किसी को पता नहीं...लेकिन लड़ सब रहे थे...कि ये क्यों दिखाया.?...

उधर गुजरात चुनाव का मौसम है...यहां भी एक कन्फ्यूज़न का 'कारवां' आ गया है...जो सोहराबुद्दीन फर्ज़ी एनकाउंटर केस की जांच कर रहे जज लोया साहिब की मौत पर कन्फ्यूज़न क्रीएट कर रहा है..'कारवां' दलील दे रहा है...कि लोया साहिब का मर्डर किया गया था..शक है कि जांच का रुख मोड़ने के लिए ऐसा हुआ...परिवार वाले भी किसी साज़िश का शक जता रहे हैं....सवाल है कि परिवार को आज ही क्यों याद आया.?...2014 के बाद से अब तक परिवार क्यों चुप रहा...जज का परिवार था... केस क्यों नहीं किया ? सहराबुद्दीन का परिवार तो एनकाउंटर के बाद कोर्ट पहुंच गया था....तो आप क्यों नहीं पहुंचे.?..और कारवां अब काहे कन्फ्यूज़न पैदा कर रहा है....गुजरात चुनाव में कन्फ्यूज़न पैदा करके उसका क्या फायदा है....ये रिपोर्ट उसने पहले क्यों नहीं छापी.?..पहले कोई रोक तो नहीं थी...जनता तक सच पहुंचाने केलिए गुजरात चुनाव का इंतज़ार क्यों किया....फिर ये उन जज साहिब की नैतिकता पर भी तो सवाल है जिन्होंने अमित शाह को इस मामले में क्लीन चिट दी थी...तो क्या जनता को अब उनपर शक करना चाहिए.?..ये भी तो कारवां को बताना चाहिए था...पता नहीं क्यों देश में हर किसी को आधी अधूरी बात करके विवाद खड़ा करने की आदत पड़  गई है.?.
.पहले कहा जाता था...कि किसी पर आॆरोप लगाने से पहले पूरी जांच होना और पुख्ता सबूत होना ज़रूरी है...लेंकिन भारत की पूरी प्रणालियों पर कन्फ्यूज़न का जोंक चिपक चुका है....सब भटका रहे है..बहुत झोल हो गया है,...सच तो तलाशना और भी मुश्किल हो गया है...जनता को फिर से विवेक से काम लेने की ज़रूरत है....क्योंकि अगर इन लहरों में भटक गए तो नतीजा देश को भुगता पड़ेगा...


भूकंप से डर नहीं लगता साहिब..!

अफगानिस्तान के हिंदकुश में आए भूकंप ने पाकिस्तान से लेकर पूरे उत्तर भारत को हिला कर रख दिया..अफगानिस्तान में तो तबाही मची ही, पाकिस्तान में भी 100 से ज़्यादा घरों के दिए बुझ गए....लेकिन इन सबके बीच ये भयानक भूकंप एक तबके के लिए दिवाली ले आया...कई लोगों को भले ही भूकंप से नुकसान हुआ हो..लेकिन इस तबके का तो फायदा ही हुआ..भूकंप तो इनके लिए जैसे सुनहरा मौका लेकर आ गया हो.. .ये तबका है अपराधियों का, लुटेरों का जिन्होंने भूकंप से तितर-बितर हुई व्यवस्था का पूरा लाभ ले लिया..भूकंप से बचने के लिए ग्रेटर नोएडा के सिंडिकेट बैंक कर्मी जब बाहर की ओर भागे..तो लुटेरों को मौका हाथ लग गया..और बैंक से 20 लाख रु. लेकर भाग गए...वैसे भूकंप आने पर अपराधियों, लुटेरों का फायदा होना कोई नई बात नहीं है..ऐसी घटनाएं पहले भी सामने आईं हैं.. जब चिली में भयंकर भूकंप आया था तो अफरा-तफरी का फायदा उठाकर स्थानीय जेल से 300 महिला कैदी फरार हो गईं थीं. वहीं नेपाल में भी भूकंप के दौरान अपराधियों की लॉट्री लग गई..उस वक्त कई खूंखार अपराधी जेल की दीवार में आई दरार का फायदा उठाकर भाग गए..जिनमें कुछ खूंखार अपराधी भी शामिल थे..इसके अलावा नेपाल में भूकंप के दौरान महिला और बच्चों के तस्करों का धंधा भी खूब फला-फूला..कई बच्चों और महिलाओं का अपहरण हो गया. चोरों ने भी जमकर हाथ साफ किया, उधर हैती के विनाशकारी भूकंप में जेलों से भागने वाले कैदियों का आंकड़ा चौकाने वाला है..यहां करीब 4 हज़ार कैदी भूकंप के दौरान भाग गए...जिसपर खुद यूएनओ ने चिंता ज़ाहिर की थी.प्राकृतिक आपदाओं के वक्त अफरा-तफरी मचना तो आम है..लेकिन उस वक्त असमाजिक तत्वों का सक्रिय हो जाना चिंता का विषय है... इस स्थिति से कैसे निपटा जाए..? क्या उपाय किए जाएं..?.कि जानें भी बच जाएं...और व्यवस्था भी ना चरमराए...इस तरह की घटनाएं विषम परिस्थितियों में भी सजगता की मांग करती हैं सरकारों और प्रशासन को इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत है

सुनपेड़ का सच

बिसाहड़ा के बाद हरियाणा का गांव सुनपेड़ जातीय भेदभाव और उसकी वजह से हुईं हत्याओं से सुलग रहा है..पूरा देश आज सुनपेड़ को दलितों और सवर्णों में बंटे गांव के तौर पर देख रहा है..जहां सवर्ण पिछड़ों के साथ बेइंसाफी करते हैं..हत्याएं कर दी जाती हैं...वहीं दलित डर के माहौल में रहते हैं...सवर्ण और दलितों की इस कशमकश में फंसे सुनपेड़ का सच क्या है... इस गांव में अगर हमेशा से ही ऐसा हो रहा था...तो अचानक कैसे सुर्खियों में आया..इतने दिन से कहां गायब था...इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए आपको थोड़ा पीछे जाना होगा..आपको याद है...कुछ साल पहले शाहरुख ख़ान की एक फिल्म आई थी MY NAME IS KHAN जिसमें उनका एक डायलॉग बड़ा ही अच्छा लगा था.." अम्मी कहती है कि दुनिया में सिर्फ दो तरह के इंसान हैं अच्छे इंसान और बुरे इंसान' ना अच्छे इंसान का कोई जाति धर्म संप्रदाय होता है और ना ही बुरे का..ये डायलॉग हमारे दिलों को छू गया था...क्योंकि इस डायलॉग ने हमारे समाज में फैली गलत धारणाओं को कचौटा था..हमने इस डायलॉग पर खूब तालियां बजाईं लेकिन प्रैक्टिकल होकर इसे कभी नहीं अपनाया. कभी इस नज़रिए से घटनाओं का विश्लेषण  नहीं किया....जब भी जहां भी कोई घटना हुई उसे फटाफट जाति, धर्म, सम्प्रदाय में बांट दिया...फरीदाबाद के सुनपेड़ में भी कुछ ऐसा ही तो हो रहा है..जहां दो परिवारों की आपसी रंजिश की वजह से हत्याएं हुईं..निर्दोषों का खून बहा..दो मासूम भी चल बसे लेकिन हमने इस बुराई को, इस बुरे काम को देखने और इससे लड़ने की बजाए इसे अगड़ों और पिछड़ों में तोड़ दिया..अगर ऐसा ना करते तो काम कैसे चलता..मीडिया को बहस का मुद्दा मिल गया..और राजनेताओं को अपनी राजनीति चमकाने का साधन..  एक के बाद एक नेता सुनपेड़ पहुंचने लगे..इसका नतीजा क्या हुआ.. पूरे देश में सुनपेड़ पर थू-थू होने लगी...पुतले फुंकने लगे...रोष होने लगा...कई दिनों का बवाल खड़ा हो गया...लेकिन इन सबके बीच सुनपेड़ शोकाकुल है..गांव के लोगों ने दो मासूमों की हत्याएं होने पर दिवाली ना मनाने का फैसला किया है...पिछले साल भी जब एक परिवार से जुड़े सदस्यों की ओर से दूसरे पक्ष के परिवार के लड़कों की हत्या की गई थी..तब भी गांव में  दिया नहीं जला था...अगड़े हों या पिछड़े सभी ने जाति, धर्म, सम्प्रदाय को भुलाकर एक दूसरे के सुख दुख में साथ दिया था.. गांव वालों की माने तो उस घटना के बाद भी सब सौहार्द से रह रहे थे.. गांव में अगर किसी सवर्ण की मृत्यु हो जाती तो उसमें सब जाति,समुदाय के लोग शामिल होते...गांव का माहौल बिल्कुल शांत था...एकता बनाए रखने के लिए गांव के लोगों ने पूरी कोशिश की..लेकिन इन सबमें एक वारदात ने पूरे गांव पर भेदभाव की तोहमत लगा दी...  आपसी रंजिश की वजह से दो परिवारों में हुई हत्याओं को लेकर पूरे गांव को अगड़ों और पिछड़ों में बांट दिया गया.हर किसी को शक की निगाह से देखा जाने लगा...इन सबके बीच बुराई कहीं छू मंतर हो गई...उसका विरोध गायब हो गया..और दलित और स्वर्ण सुर्खियां बन गए..मामला दो परिवारों की आपसी रंजिश का था लेकिन उसे ऐसे पेश किया गया जैसे ये पूरा प्रकरण दलितों और सवर्णों का है..बुरा काम उन दो परिवारों ने एक दूसरे के साथ किया..लेकिन सवाल पूरे गांव के लोगों पर उठ रहे हैं...पूरा गांव जातीय भेदभाव को लेकर कटघरे में हैं... आखिर क्यों इस प्रकरण को सीधे तौर पर नहीं देखा जा रहा.?.आख़िर क्यों इस बुरे काम में भी जाति को ढूंढकर ही धारणाएं बनाईं जा रही हैं....क्या ये हमारी एकता के लिए घातक नहीं है...आखिर कौन हैं वो लोग जो आपसी रंजिश के इस खेल में भी समाज को बांटने की साज़िशें रच रहे हैं...?. कौन हैं वो जो समाज को बांट कर लाभ कमाना चाहते हैं.?. ये आप और मैं अच्छी तरह से जानते हैं... अफसोस इस बात का है कि जो लोग आज की तारीख में जाति, सम्प्रदाय से ऊपर उठकर सिर्फ बुराई के ख़िलाफ हैं उनको पूछने वाला कोई नहीं है...मीडिया  ऐसे लोगों को भूले भटके ही कवरेज देता है..देता भी है तो उनके मुंह से किसी ना किसी तरीके अपने लाभ की बात निकलवाने की कोशिश रहती है...क्यों नहीं मीडिया ऐसी ख़बरों को दिखाते हुए सिर्फ वारदात का ब्यौरा देता..जाति बताने की क्या ज़रूरत पड़ जाती है..वहीं तथाकथित सेक्यूलर नेता भी जाति सुनते ही वहां पहुंच जाते हैं...क्यों नहीं सिर्फ बुरे काम की निंदा करते.....इस घटना में दो मासूमों का मारा जाना अहम है ना कि मारे गए दो मासूमों का किसी जाति विशेष से संबंध रखना...अगर उनकी जाति ना पता चलती तो क्या बच्चों के प्रति हमारी संवेदनाएं कम हो जातीं..?.हमें हत्याओं का विरोध करना चाहिए..फिर वो चाहे दलित की हो या फिर सवर्णों की. सिर्फ.बुराई का विरोध होना चाहिए...सुनपेड़ भी बुराई के विरोध में हैं..लेकिन उसकी सच्चाई सुनने वाला कोई नहीं..है...

विरोध का ये कैसा तरीका..?

दादरी कांड और गुलाम अली का कंसर्ट रोके जाने और इस जैसी अन्य घटनाओं का चौतरफा विरोध सह रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आख़िरकार ख़ामोशी तोड़ दी ..प्रधानमंत्री ने एक ओर जहां इन घटनाओं को अवांछित और दुर्भाग्यपूर्ण बताया तो वहीं कई लोगों पर धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति करने की बात भी कही, लेकिन विपक्ष अब भी पीएम मोदी को ही इन सब के लिए ज़िम्मेदार बता रहा है.. शिवसेना अपनी हरकतों के लिए पीएम मोदी को कसूरवार ठहरा रही है...शिवसेना का मानना है कि पीएम मोदी दंगों के लिए ही जाने जाते हैं तो ऐसे में उनकी ओर से गुलाम अली और कुलकर्णी घटनाओं की निंदा करना दुर्भाग्यपूर्ण है । वहीं कांग्रेस ने भी पीएम को देश के 125 करोड़ लोगों के लिए ज़िम्मेदार बताया है..कांग्रेस की माने तो देश में जो कुछ भी होता है उसके लिए पीएम की ज़िम्मेदारी बनती है...और वो उससे भाग नहीं सकते...उधर लेखकों का एक-एक कर सम्मान वापिस करना जारी है..चौतरफा हमले से घिरे प्रधानमंत्री मोदी की ना चुप रहकर बन पा रही है ना ही ख़ामोशी तोड़कर..हर ओर से उनको इन घटनाओं के लिए अजीबोगरीब विरोध सहना पड़ रहा है..निश्चित तौर इस विरोध में राजनीति का फ्लेवर तो है ही..पूर्वाग्रह का टच भी काम कर रहा है...शिवसेना जिस तरह खुद की हरकतों के लिए बीजेपी को और पीएम मोदी को दोषी ठहरा रही है वो हैरान करने वाला है...शिवसेना नगर निगम चुनावों में अपनी साख बचाने की जुगत में लगी है..और अपने एजेंडे को पोषित कर रही है...इसलिए इस तरह घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है...वहीं कांग्रेस का आरोप भी अटपटा सा है..कांग्रेस शायद मुज्ज़फरनगर दंगों के वक्त को भूल गई है...जब केंद्र में बैठी मनमोहन सरकार ने दंगों के लिए राज्य सरकार को दोषी ठहराया था..उस वक्त मनमोहन सरकार ने उन दंगों की ज़िम्मेदारी और उनके कार्यकाल में राज्यों में हुए घोटालों की ज़िम्मेदारी खुद क्यों नहीं ले ली...सामने आकर क्यों नहीं खुद को पूरे देश के लिए ज़िम्मेदार बताया...अब बात अपना सम्मान वापस लौटा रहे लेखकों की करते हैं...लेखकों को भारत में फैली असहिष्णुता की चिंता सता रही है...लेकिन ये चिंता इतनी देर से क्यों...? आख़िर क्यों लेखकों ने इतना इंतज़ार किया..इससे पहले भी कई बड़ी बड़ी घटनाएं हुईं...तब क्यों अपने सम्मान वापस नहीं कर दिए..अब ऐसी क्या आफत आ गई जो लेखकों की सहनशीलता जवाब दे रही है..भारत देश ने इससे बड़े बड़े ज़ख़्मों को सहा है.लेखक समाज को दिशा दिखाने वाले होने चाहिए लेकिन जो काम चंद लेखकों की ओर से किया जा रहा है...वो समाज को दिशाहीन कर रहा है..उनका विरोध तर्क हीन और पूर्वाग्रह से पीड़ित नज़र आ रहा है..वहीं मीडिया भी इस भेड़चाल में शामिल  है....वो भी बिना विश्लेषण के विरोध की इस लहर को सीधे सीधे परोस रहा है..जिससे देश की जनता भ्रमित हो रही है...कई लोगों को आम चर्चाओं में दादरी, महाराष्ट्र और पंजाब में हो रहे हो-हल्ले के लिए मोदी को ज़िम्मेदार ठहराते देखा जा सकता है..इसके पीछे जब उनसे कारण पूछा जाता है तो वो सीधे सीधे बोलते हैं..."मोदी की सरकार है दंगे तो भड़केंगे ही..' माना गुजरात दंगों का आघात हमारे ज़हन में गहरा है..लेकिन इस बात से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि न्यायपालिका ने पीएम मोदी को इन मामलों में क्लीनचिट दी है...देश के एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री बनाया है...तो अब इतिहास की उस बात को वर्तमान में रखकर घटनाओं का आंकलन करना कितना जायज़ है...क्या देश में हो रही घटनाओं के लिए राज्य सरकार, क्षेत्र का प्रशासन ज़िम्मेदार नहीं, क्या अफवाहों पर विश्वास करके किसी का कत्ल करने वाली जनता दोषी नहीं...क्या राजनीति से प्रेरित होकर किताबें लिखने वाले लेखक ज़िम्मेदार नहीं...भड़काऊ चीज़ें दिखाकर अपना उल्लू सीधा करने वाला मीडिया दोषी नहीं..क्या दूसरों की भावनाओं को आहत करने वाले दोषी नहीं...क्या इस पूरी असहनशीलता के लिए हम सब दोषी नहीं...क्या इन सभी चीज़ों के लिए सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही दोषी दिखाई देते हैं..शुक्र है विरोध करने वालों ने क्रिकेट के मैदान में भारत की हार और लोगों के रवैए के लिए पीएम मोदी को ज़िम्मेदार नहीं बताया. क्योंकी जिस तरह से हर बात पर पीएम मोदी का विरोध हो रहा है...उसे देखते हुए तो किसी भी चीज़ के लिए पीएम को विरोध के लिए तैयार रहना चाहिए....किसी ने सच ही कहा है किसी पर दोष मढ़ना बहुत आसान है...आज हमारा हर वर्ग इसी से प्रेरित नज़र आता है..




ये पाकिस्तान की चाल तो नहीं..?

आपको याद है कि कुछ दिन पहले भारत के टीवी चैनल्स पर पीओके का मंज़र दिखाया गया था...जिसमें वहां के स्थानीय लोग आज़ादी के लिए आंदोलन कर रहे थे...टीवी चैनल्स ने पाकिस्तानी फौज की ओर लोगों पर हो रही क्रूरता को भी दिखाया था..कि कैसे पाकिस्तानी फौज वहां के लोगों को जबरन आतंकी बनने के लिए मजबूर करती है....ये सब तब टेलीकास्ट हो रहा था..जब नवाज़ शरीफ संयुक्त राष्ट्र में कश्मीरी अलगाववादियों के अधिकारों की बातकर रहे थे...और भारत सरकार पर उनके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का इल्ज़ाम लगा रहे थे...इस वीडियो से जहां भारत ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया था...और दुनिया को उसके दोगले चेहरे की तस्वीर भी दिखाई थी.....लेकिन उसके कुछ दिन बाद ही कश्मीर में हालात बिल्कुल बदल गए....कश्मीर में सड़कों पर प्रदर्शन होने लगा....विरोध में नारे लगने लगे...माहौल गरमा गया.....जिसका केंद्र बीफ बन गया...और सारा विरोध इसी के आगे पीछे घूमने लगा..बीफ को कश्मीरी मुसलमानों के हक के साथ जोड़ दिया गया....घाटी जलने लगी...विधानसभा में भी हंगामा हुआ ..तो बाज़ार भी बंद हो गए.दुनिया कश्मीर पर बात करने लगी.....ये सब अचानक से नहीं हुआ.....इसके पीछे कहीं ना कहीं पाकिस्तान का हाथ होने का शक है.....सेना के एक पूर्व अफसर ने भी इस ओर से ध्यान दिलाया है...उनके मुताबिक आए दिन हो रही आतंकी घुसपैठ, हिंदु मुसलमान को तोड़ने की कोशिश, विधानसभा में जारी हो-हल्ला, पाकिस्तान की चाल है..इन सभी मुद्दों को जोड़कर देखने की ज़रूरत है...पाकिस्तान का मकसद घाटी की आबो-हवा को आतंकित करना है...पाक घाटी के लोगों में अविश्वास पैदा करना चाहता है...पाकिस्तान तो मौकापरस्त है वो चाहता है कि वैश्विक स्तर पर कश्मीर को लेकर भारत पर सवाल उठें...और उसे संयुक्त राष्ट्र में अपनी बात को बल देकर कहने का मौका मिले...ऐसे में ये हमारी ज़िम्मेदारी है कि ऐसे नापाक पड़ोसी से सतर्क रहा जाए...वहीं मुफ्ती-मोदी सरकार को भी प्रशासन व्यवस्था पर ध्यान देने की ज़रूरत है.क्योंकी विधानसभा में उनके नेताओं की भी उग्रता सामने आ रही है....जिसने माहौल को और बिगाड़ने का ही काम किया है...इसलिए ज़रूरी है कि पाकिस्तान की इन बारीक चालों को समझा जाए...और उसी के मुताबिक सयंम से काम लिया जाए...

गाय क्यों बने राष्ट्रीय पशु..?


दादरी के बिसाहड़ा गांव में जो कुछ हुआ उसने हमारे समाज के सामने कई सवालों को खड़ा कर दिया है...उनमें से ही एक सवाल उठा है गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने का....कई मंत्रियों, नेताओं ने इसके लिए अपने अपने विचार रखे हैं...हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने भी गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की सिफारिश  की है.....तो बाबा रामदेव ने भी इसपर अपनी सहमति जताई है...गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने का ये सवाल सच में आज सोचने लायक है...जिसके पीछे कई तर्क दिए जा सकते हैं...पहला तर्क हमारे सामाजिक तानेबाने से जुड़ा है...भारतीय समाज विभिन्नताओं से भरा है...लेकिन भारत के प्रबुद्ध लोगों ने इन विभिन्नताओं को एकता में पिरौने के लिए हर कोशिश की है....हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई सबकी मान्यताएं, सबके भगवान अलग हैं...लेकिन भारत ने सबसे ऊपर की बात कह कर भगवान को एक माना है...सभी धर्मों की एक जैसी बातों को किताबों में पढ़ाया जाता है....ताकि बच्चों को ये ज्ञान मिल सके कि हम सब एक हैं......हर उस अच्छी चीज़ को जोड़ने की कोशिश हुई है...जिसने भारत को एकता की ओर बढ़ाया है...गायकों ने अपने गीतों से...कवियों ने अपनी कविताओं से...हर किसी ने कोशिश की है....तो ऐसे में हम गाय को कैसे भूल सकते हैं...जी हां गाय..एक ऐसा पशु जिसने हमें एक रहने की प्रेरणा दी है....जिसे हर किसी ने जाना और माना है..हिंदू धर्म में तो इसे मां का दर्जा दिया ही गया है...इस्लाम धर्म ग्रंथों में भी गाय के महत्व को माना गया है....हदिस-ए-मुबारक में गाय के दूध को उत्तम बताया गया है...साथ ही गाय के गोश्त को बीमारी करने वाला कहा गया है... गोकशी यानी गोहत्या को भी बुरा बताया गया है.. अब बात सिख धर्म की करते हैं...सिख धर्मगुरुओं ने भी गाय का गुणगाण किया है...
सिख धर्म में दसवें गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना करते हुए कहा था कि यह पंथ आर्य धर्म, गौ-ब्राह्मण, साधु-संत और दीन दुखी जन की रक्षा के लिए बना है। उन्होंने अपने ‘दशम ग्रंथ’ में एक जगह लिखा है, 
'यही देहु आज्ञा तुर्क को सपाऊँ, गो घात का दुख जगत से हटाऊँ। 
यही आस पूरन करो तौं हमारी मिटे कष्ट गौऊन छुटे खेद भारी।' 
सन 1871 में पंजाब में मलेर कोटला में नामधारी सिखों ने गो रक्षा के लिए अपनी कुर्बानियां दी थीं
इसाई धर्म का भी गाय से जुड़ाव रहा है...ईसा मसीह का जन्म गऊ शाला में हुआ था...इसलिए उनका गायों से ख़ास लगाव था...
आर्थिक ताने बाने की बात करें...तो गाय भारतीय गांवों की आर्थिकता का अहम हिस्सा रही हैं....
.भारत के गांवों की भेड़, बकरी, ऊंट के बिना तो कल्पना की जा सकती है...लेकिन गाय के बिना भारत के गांव की कल्पना करना बेमानी है...गाय  से जहां लोगों को पौष्टिक दूध मिल रहा है...तो वहीं उसके दूध को बेचकर वो रोज़गार भी पा रहे हैं.....गाय को ग्रामीण इलाकों में किसी परिवार के सदस्य की तरह ही पाला जाता है.....फिर चाहे वो हिंदू की गाय हो या फिर मुसलमान की..सर्वोत्तम मानी जाने वाली भारत की देशी गाय की तादात लगातार घटती जा रही है....जिसे बचाना बेहद ज़रूरी है...इसकी उपयोगिता को जानकर ही ब्राज़ील, अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भारत में पाई जाने वाली गिर नस्ल को अपने देश ले जाकर पाल रहे हैं...और उनका निर्यात चीन जैसे देशों को भी कर रहे हैं.

गाय की इस महत्ता को धर्मों ने तो पहचाना ही भारत में विदेश से आईं ताकतों ने भी खूब सराहा...खुद अकबर के शासनकाल में गोहत्या पर प्रतिबंध लगा हुआ था... औरंगज़ेब ने भी गोहत्या पर पाबंदी लगा रखी थी. हर कोई गाय के महत्व को जानता और मानता था...गाय के अलावा कोई और पशु ऐसी ख़ासियतें रखता हो तो ज़रा बताएं...जिसको हर धर्म ने माना हो....जिसको मुगल बादशाहों ने पहचाना हो..जिसको पालने की सिख धर्मगुरु ने वकालत की हो...जिसके दूध, गोबर, मूत्र, का कई बिमारियों को सही करने में इस्तेमाल हुआ  .जिसके चलने से मिट्टी की उर्वर्ता भी बढ़ जाती हो. ..जो मरकर भी उपयोगी हो...ऐसा पशु है गाय...
अब कोई कहेगा कि गाय की छवि कमज़ोर जानवर की है...तो इसे भारत का राष्ट्रीय प्रतीक कैसे बनाया जा सकता है..जब गाय अपने दूध से पूरे देश में ताकत का संचार कर रही है...बीमारियों से लड़ने की ताकत दे रही है..तो गाय की छवि को कमज़ोर कैसे कहा जा सकता है...वहीं गाय अहिंसा का भी प्रतीक है...जिसका भारत हमेशा से पक्षधर रहा है.. महान धर्मनिर्पेक्ष और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी ने भी गाय को अहम बताया है...गांधी ने गाय के लिए कहा है कि अगर कहीं गाय कटती है तो समझा जाए वहां मुझे काटा जा रहा है....भारत के राष्ट्रपिता की ओर से दिया गया ये बयान क्या कोई मायने नहीं रखता....क्या हमें बापू के इस संदेश की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए...इन सभी तर्कों को ध्यान में रखकर  गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की बात कही या सोची जाए तो गलत नहीं होगा....बस सबको एक होकर इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत है.....


..

नेपाल का इमोशनल अत्याचार..!


जब किसी कमज़ोर शख़्स को किसी ताकतवर शख़्स से कोई बात मनवानी हो तो वो अपनी कमज़ोरी का खूब इस्तेमाल करता है...उसकी कमज़ोरी ही उसकी ताकत बन जाती है....और वो उसी के सहारे अपने से ताकतवर शख़्स को अपने बस में करने की कोशिश करता है...ऐसा ही कुछ आजकल भारत का पड़ोसी देश नेपाल कर रहा है...नेपाल में आजकल पैट्रोल डीज़ल और अन्य ज़रूरी सामानों की  भारी कमी आ गई है....जिसकी वजह से जनता में असंतोष पैदा हो रहा है...अब नेपाल अपने यहां मची इस खलबली के लिए भारत को दोषी बता रहा है...इतना ही नहीं नेपाल ने भारत की शिकायत संयुक्त राष्ट्र में भी कर दी है..नेपाल का आरोप है कि भारत जानबूझ कर अपने यहां से माल की सप्लाई रोके हुए है...
दरअसल भारत हमेशा से ही नेपाल के लिए ज़रूरी सामान पहुंचाता रहा है....लेकिन इन दिनों नेपाल में  संविधान को लेकर विवाद जारी है...मधेसी इलाके के लोग संविधान को स्वीकार नहीं कर रहे हैं....और संविधान में भेदभाव का आरोप लगाते हुए संधोशन की मांग कर रहे हैं...मधेस नेपाल का वो इलाका है जिसकी सीमा भारत से सटती है...अपनी मांगों को लेकर आंदोलन पर बैठे मधेसियों ने नाकेबंदी कर रखी है....जिसकी वजह से भारत से नेपाल सीमा पर पहुंच रही गाड़ियां वापस लौट रही हैं...लेकिन नेपाल अपने आतंरिक हालातों को स्वीकारने की बजाए भारत को आइना दिखाने में लगा है...इतना ही नहीं नेपाल ने भारत को चीन से मदद लेने धमकी भी दे दी है...नेपाल ये धौंस ऐसे ही नहीं दिखा रहा...दरअसल नेपाल अब अपनी ताकत को पहचान चुका है...और अपनी कमज़ोरी को दूर करने के लिए उसका बेजा इस्तेमाल कर रहा है...नेपाल से रिश्ते कायम रखना भारत और चीन दोनों के लिए अहमियत रखता है...इस सच को जानते हुए वो भारत पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है...नेपाल जानता है कि भारत कभी भी नेपाल को नाराज़ नहीं करना चाहेगा...इसी चीज़ का नाजायज़ फायदा उठाने की कोशिश हो रही है...सच ये भी है कि नेपाल को अब भारत की मदद की ज़्यादा ज़रूरत नहीं रह गई है...क्योंकी अब नेपाल को कई विदेशी संस्थाएं भी मदद दे रही हैं..इसलिए अब भारत का ये पुराना साथी रिश्तों को भूल रहा है...ऐसे वक्त में भारत को दोनों तरफ से हालातों को संभालने की ज़रूरत है...नेपाल जिस नाकेबंदी के लिए भारत को ज़िम्मेदार ठहरा रहा है...उसपर भारत की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है...जो सही नहीं है...भारत को भी अपना रुख साफ करना चाहिए.....साथ ही नेपाल की मदद के लिए जल्द से जल्द कोशिश होनी चाहिए....अगर सड़क मार्ग से सामान नहीं भेजा जा सकता है...तो हवाई मार्ग तो खुले हैं....नेपाल की जनता को भारत पर विश्वास है...जो भारत के लिए सबसे अहम है..जिसको बनाए रखने के लिए भारत को हरसंभव कोशिश करनी चाहिए.

मैं हीजड़ा नहीं इंसान हूं...!!



किन्नर जिन्हें हम आम बोलचाल में हीजड़ा कह देते हैं हिजड़ा क्या है..कौतूहल का विषय....एक गाली, असक्षमता की निशानी, बेबस अवस्था या फिर एक ऐसा मर्द, जिसने औरतों की तरह चूड़ियां पहनी है...एक ऐसा समूह जो ना जाने कहां से जानकारी जुटा कर शादी विवाह के माहौल में ताली पीटते हुए लोगों के घरों में ज़बरदस्ती आन घुसते हैं....

किन्नरों के बारे में हमारी जानकारी इन बातों के इर्द-गिर्द ही तो घूमती है...हमने इस से ज़्यादा ना तो इनके बारे में जानने की कोशिश की और ना ही इस बिरादरी ने कभी मुखरता दिखाई......लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने हमें किन्नरों के बारे में हमारी इस संकीर्ण जानकारी के दायरे को बदलने पर मजबूर कर दिया है....देश की उच्चतम न्यायालय ने किन्नरों को तीसरी लिंग श्रेणी के रुप में मान्यता दे दी है. यानि...पुरुष, महिला के बाद इनको भी तीसरे लिंग के रुप में स्वीकार किया गया है...ये एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला है जिसके आने से गुमनामी के अंधेरे में जी रहे इन किन्नरों को एक नया जन्म मिला है...जहां इनके पास वो सब सुविधाएं और अधिकार होगें जो संविधान ने एक आम नागरिक को दिए हैं..पर एक बड़ा सच तो ये है कि हममें से ज़्यादातर लोग ये इस बात से ही वाकिफ नहीं हैं कि आज तक इनके साथ क्या क्या क्रूर अन्याय हुए है...आइए हम इनके साथ हुए अन्यायों की एक लम्बी फेहरिस्त आपको बताते हैं...

अन्याय नंबर 1:  4000 साल पुरानी इस जाति ने महाभारत, रामायण, कामसूत्र जैसे ग्रंथों और कई बड़े राजाओं के दरबार में एक विशेष स्छान पर होने के प्रमाण दिए हैं लेकिन आज तक इनके पास अपनी पहचान का सबूत देने के लिए एक जन्म प्रमाण पत्र नहीं हैं...

अन्याय नंबर 2: आधार कार्ड, राशन कार्ड, जॉब कार्ड, पासपोर्ट, लाइसेंस जैसीं आधारभूत सुविधाओं से ये महरुम हैं

अन्याय नंबर 3: हमारे देश में किन्नर है ही नहीं..! ये मैं नहीं ये सरकारी दस्तावेज़ कहते हैं... किसी भी देश में किसी समुदाय के होने का प्रमाण कैसे मिलता है..?. जणगणना से....लेकिन आज तक इनकी कोई आधिकारिक गिनती नहीं की गई... 2011 में सी.वाई कुरैशी के प्रयासों से जणगणना में इन्हें अन्य की श्रेणी में रखा है.....यानि यहां भी इन्हें कोई पहचान नहीं दी गई

अन्याय नंबर 4: गिनती के सरकारी आंकड़े ना होने की वजह से ये समुदाय राज्यों और केंद्र की योजनाओं का कभी टारगेट नहीं रहे, इनके कौशल विकास के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है...

अन्याय नंबर 5: घर में बच्चा पैदा होने पर जिन किन्नरों से हमारा समाज आशीष लेना पसंद करता है वही सभ्य समाज स्कूल में अपने बच्चे को एक किन्नर के साथ नहीं पढ़ाना चाहता, जिस दबाव की वजह से इनको स्कूली शिक्षा से वंचित रहना पड़ता है।

अन्याय नंबर 6: शिक्षा ना मिलने की वजह से इनको कहीं नौकरी मिल पाना असंभव हो जाता है।...ऐसे में आजीविका चलाने के लिए अगर ये लोग स्वरोजगार के बारे में सोचें भी तो बैंक इनको स्थाई आमदनी का स्त्रोत ना होने की वजह से ऋण नहीं देते, बैंक के दस्तावेज़ों में भी महिला

पुरुष के अलावा कोई तीसरा स्थान नहीं है।..नौकरियां देना तो दूर की बात.. इनकी विकलांगता को ढाल बना कर इस्तेमाल कर लिया जाता है.. ...मुंबई में 2001 में बैंकर श्री शेट्टी ने बैंक की तरफ से दिए गए कर्ज को वसूलने और बिहार सरकार ने 2006 में टेक्स कलेक्टर के रूप में इनसे काम लिया था इस तरह के कामों ने इनको काम तो दिलाया पर लेकिन यह अधिकार के रूप में नहीं आया, बल्कि इस काम को ऐसे भी देखा गया कि ये तो पैसा निकाल ही लायेंगे।

अन्याय नंबर 7: अगर स्वास्थ्य सुविधाओं की चर्चा करें तो भी ये बिरादरी पिछड़ी हुई है...एक चैनल को दिए इंटरव्यू में किन्नर अनु का कहना है कि अगर हम अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने जाते हैं..डॉक्टर इनके साथ अछूतों सा व्यवहार करते हैं..और अगर छूते भी हैं तो गलत तरीके से...जिससे इनको सही ईलाज नहीं मिल पाता...भारत में स्त्री रोग, पुरुष रोग और शिशु रोग विशेषज्ञ हैं..लेकिन इनके लिए किसी भी तरह की अलग सुविधा नहीं है..सार्वजनिक स्थानों पर बने सुलभ शौचालय की सुविधा भी इनके लिए दुर्लभ है..क्योंकि इन्हे सिर्फ पुरुष और महिला के नज़रिए से बनाया गया है..ऐसे में इन लोगों का क्या जो ना तो स्त्री हैं ना ही पुरुष...?

अन्याय नंबर 8: सरकार ने इनके लिए पेंशन स्कीम तो चलाई जिसमें एक उम्र बीतने के बाद इनकों 1000 रुपये प्रति महीने का दिए जाने का प्रावधान था...लेकिन यहां भी इनके साथ हुआ एक सबसे बड़ा मज़ाक..पेंशन स्कीम के लिए भी जन्म प्रमाण पत्र की दरकार है..तो बताइए जिनके जन्म पर ही सवालिया निसान लगा दिया गया वो जन्म प्रमाण पत्र कहां से लाएं...

अन्याय नंबर 9: संविधान भी तीसरे लिंग के व्यक्तियों को आदतन अपराधी मानता है..अपराधिक अपराधी अधिनियम 1971 के तहत इनको आदतन अपराधी माना गया है..इनको शक के आधार पर ही गिरफ्तार किया जा सकता है..

अन्याय नंबर 10:  भारत के संविधान में कमज़ोर वर्ग की एक सूची सुझाई गई है जिसमें बच्चे, महिलाएं बुज़ुर्ग, विकलांग आदि आते हैं तो ये लोग भी तो एक सैक्सुअल बिमारी का शिकार हैं...जिसका फिलहाल कोई इलाज नहीं है तो ऐसे में इन्हें इस श्रेणी में रख कर क्यों नहीं देखा जाता क्या ये बर्ताव अन्याय नहीं है..?


ये सब अन्याय तो उन अन्यायों का केवल आधार मात्र ही हैं जो इस बिरादरी को सहने पड़े...इन आधारभूत अधिकारों के ना होने पर ना जाने इनका कितनी बार शोषण हुआ होगा..कौन जाने इनको किन किन मुसीबतों का सामना करना पड़ा होगा....शायद उसी का नतीजा है कि इस बिरादरी में कुछ लोगों के कदम वैश्यावृति के विष और अपराध की दुनिया की तरफ बढ़ गए...आज ये हमें रेड लाइट पर भीख मांगते अपने पेट के लिए नाचते गाते नज़र आते हैं।.....क्या कारण रहे कि आज तक सरकार और समाज ने इनकी हालत से वाकिफ होते हुए भी चुप्पी साधे रखी.?.अगर आज हम किसी को जाति के आधार पर कोई कटाक्ष करते हैं तो समाज को ये गवारा नहीं होता।.जब किसी एडस के मरीज़ की बात होती है तो उसके साथ सहानुभूति करने की बात कही जाती है.. बताया जाता है कि उनको छूने से एडस नहीं होता..एडस मरीजों को अगर स्कूलों या नौकरी से निकाल दिया जाए तो कानूनी कार्रवाई भी हो जाती है......फिर जन्मजात सैक्सुअली विकलांग इन किन्नर लोगों के साथ ऐसा पक्षपात क्यों....हमारे संविधान ने हमे समानता, स्वतंत्रता जैसे कई अधिकार दिए.लेकिन लगता है इस बिरादरी से तो हमने मानव होने के अधिकार भी छीन लिए.जिसकी झलक इनके रिती-रिवाज़ों पर भी साफ दिखाई देती है. इनकी तो जिंदगीं भी गुमनामी में और मरने पर भी उजाला नसीब नहीं..इन्होनें मजबूरन आधी रात के अंधेरे में मृतक किन्नर का दाह संस्कार करने की प्रथा बना ली..अपनी ज़िदगी की कठोर परेशानियों..से झलाकर ये अपने जन्म को ही कोसने लगे..आलम ये है कि सारा गुस्सा मृतक किन्नर को जूते चप्पलों से पीट पीट कर निकालते हैं... और दुआ करते हैं कि ऐसा जन्म लेकर वापस इस दुनिया में मत आना...

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इनकी इस मजबूरी को ख़त्म कर दिया है..और लोकतंत्र की परिभाषा को सार्थक कर दिया है..इसके लिए मानवाधिकार संस्थाएं और वो सभी एनजीओ धन्यवाद के पात्र हैं..जिन्होंने समाज और व्यवस्था से अलग खड़े होकर किन्नरों की पहचान के लिए लड़ाई लड़ी..वहीं दूसरी ओर मीडिया, राजनेता और समाज को अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर इस बिरादरी को देखने की ज़रुरत है..माननीय उच्च न्यायालय ने तो इनके साथ न्याय कर दिया लेकिन इनके सबसे बड़े अपराधी तो हम और आप हैं....इसलिए हमारी ये ज़िम्मेदारी है कि हम इनके अधिकारों के सरंक्षण के लिए प्रयासरत रहें...कष्ट सहकर भी दुआएं देने वाली इस बिरादरी को इंसान समझें...और इनकी इंसानियत के बदले इनको इंसानियत ही बांटे...


बस! और टुकड़े नहीं!

मीडिया में सुनने पर आश्चर्य होता है जब कहा जाता है कि "दलित कन्या" के साथ हुआ बलात्कार! कन्या तो कन्या है चाहे वो दलित वर्ग की हो या स्वर्ण।अत्याचारी ने अत्याचार, "कन्या" के साथ किया है जात -वर्ग के साथ नहीं।अतः अत्याचार के मुद्दे पर बाँटना बंद करें। बेटियां सबकी समान होतीं हैं।आप का क्या कहना है???